'अँधेरे समय के अंधे लोग'

      'अँधेरे समय के अंधे लोग' आधुनिक समाज के अंधे लोगों में वैज्ञानिकता के बावजूद समाज में फैले भक्ति  से उपजे अंधविश्वास के कारण पैदा हुए डर और भटकाव को देखने समझने और हल की तरफ बढ़ने का एक छोटा प्रयास भर है...

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तभी सोखा
अनुभव की झोरी से
चन्द्रमा की चौदह कलाएँ निकालकर
उछाल देता है आकाश में
एक साथ
चौदह चंद्रकलाएं तैरने लगती हैं
और डरे लोगों की
आस्थाओं के चारो तरफ चक्कर काटती हैं
इस तरह भ्रम का
अबूझ अँधेरा फैलाकर
जैसे ही मन्दिर की ओर मुँह कर
ओझा मुस्कराते हुए हाथ जोड़कर सर झुकाता है
वैसे ही
भीतर से खोखली, लिजलिजी
चिंता के जुओं और
दैवीय आतंक से घबराई भीड़
भीतर ही भीतर एकदम से झुक सी जाती हैं
बाबा के प्रेमिल शब्द
गढ़ लेते हैं परिभाषा भावनात्मक-हिंसा की
ऊँगलियों के इशारे
और धर्म के हल्के दवाब से ही
खड़ी भीड़ की
बदल जाती है पूरी की पूरी दुनिया ही...।
         
                               ('अँधेरे समय के अंधे लोग' से)

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