Posts

Image
जहां मैं उगा पला बढ़ा खड़ा हुआ खुद के पांवों के सहारे अनंतर वहीं के होने का बना रहा अहसास बरसों-बरस जैसे आज... एक बित्ता विश्वास...
      एक-दूसरे को धता देकर इस भागती दुनिया में मानवता के लिए वापस लौटना एक जरुरी प्रक्रिया है। आज प्रस्तुत है मेरी अपनी ही कविता.... लौटना ****** लौटना एक क्रिया है जो मनुष्यों के व्याकरण में देह की इच्छायों से टपकती है कठिन है इस भागती दुनिया में धार में बहते फूल का दूसरी तरफ लौटना शहरों की तरफ भाग रहे लोगों का गाँवों की तरफ लौटना घोषित-अघोषित बढ़ते अँधेरे में उजाले की ओर लौटना ऐसे हर लौटने पर मुश्किल वक्त में थरथराती है उम्मीद... ऐसा नही कि लौटने की सारी क्रियाएं बंद हैं वह हो रही हैं उम्मीद के मुहाने पर जैसे हर बार गहरी बेचैनी लिए लौटतें हैं किसान खेतों में बाढ़ में पानी से घिरे लोग लौटते हैं घर लादकर सूखी जमीन पर मशीनरी स्कूल से थके बच्चे लौटतें हैं अपने घरों में भिखारी ठाकुर के वंशज लौटतें हैं संस्कृति और भाषा को बचाने के लिए भोजपुरी की ओर.... वैसे ही क्रियायों की उदासी झाड़कर लौटता हूँ मैं आदमियत की तरफ जब लुहलुहान हो जाती है मेरी पीठ प्रतिरोध को कंधे पर रखे-रखे स्वाद में बदलने लगती हैं रक्तरंजित दीवारें फ़िजां में गूँजती शोषित हँसी ...

सलूक जिससे किया मैने आशिकाना किया:

Image
    विमलेंदु जी द्वारा जीवन क्या जिया और क्या खूब जम  द्वारा नामवर जी के जन्मदिन पर नायाब और महत्वपूर्ण आलेख.....                 सलूक जिससे किया मैने आशिकाना किया ===========================           28 जुलाई को नामवर सिंह जब नब्बे साल के हुए तो उनके विरोधी उन्हें चुका हुआ मानकर उत्साह के अतिरेक में थे. उनके जन्मदिन पर इन्दिरा गाँधी कलाकेन्द्र, दिल्ली में एक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें गृहमंत्री राजनाथ सिंह और संस्कृति मंत्री महेश वर्मा भी शामिल हुए. नामवर विरोधी कई दिन पहले से अफवाह उड़ा रहे थे कि नामवर संघी हो गए हैं. सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने अभियान चला कर लोगों को भ्रमित किया. नामवर की छवि और निष्ठा पर यथाशक्ति प्रहार किए गए. लेकिन नामवर तो नामवर ही ठहरे ! सरकार से मुखातिब होकर कह आए कि समालोचक सरकार और सत्ता का प्रतिपक्ष होता है. और यह भी प्रकट कर दिया कि वे अभी दस साल और जीना चाहते हैं ताकि कुछ लोगों की छाती पर मूँग दल सकें. तो लीजिए श्रोताओं को मुग्ध करते, विरोधियों को चित...

'आषाढ़ का एक दिन' का मंचन

Image
समीर कुमार पाण्डेय की एक रपट ***********************         आज बापू भवन बलिया में लगातार जोरदार बारिश के बावजूद संकल्प साहित्यिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था, बलिया द्वारा आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ जनार्दन राय जी ने दीप प्रज्वलित कर किया।         जिसके प्रथम सत्र में संकल्प के सचिव आशीष त्रिवेदी की अगुआई में 'संकल्प' द्वारा जनपद के साहित्य कला प्रेमियों की उपस्थिति में साहित्य जगत के प्रख्यात कवि अनहद पत्रिका के सम्पादक, 'मोछू नेटुआ' जैसी महत्वपूर्ण कविता के प्रणेता संतोष चतुर्वेदी, अपनी देसज भाषा के शब्दों से चकित कर देने वाले कहानी लेखक असित मिश्र और अद्भुत रंगकर्मी अमित पाण्डेय को संकल्प सम्मान-2017 से सम्मानित किया गया। यह क्षण बलिया जैसे छोटे शहर के नगरवासियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था।       कार्यक्रम के दूसरे सत्र में मोहन राकेश कृत नाटक 'आषाढ़ का एक दिन' का सफल मंचन आशीष त्रिवेदी के निर्देशन में किया गया। 'आषाढ़ का एक दिन' (सन् 1958) नाटककार मोहन राकेश द्वारा रचित हिंदी के आधुनिक युग का प्रथम नाटक कहा जाता है।...

अँधेरे समय के अंधे लोग

 'अँधेरे समय के अंधे लोग' आधुनिक समाज के अंधे लोगों में वैज्ञानिकता के बावजूद समाज में फैले भक्ति  से उपजे अंधविश्वास के कारण पैदा हुए डर और भटकाव को देखने समझने और हल की तरफ बढ़ने का एक छोटा प्रयास भर है... क्रमशः (5) इस अंधेरे में पता नही चलता राह किधर है और खाई किधर स्वार्थों की सुखयात्रा में शोषण की बढ़ती अतिशयता अंधी आँखें नही देख पाती छिपी वेदना गुप्त चिंताओं की छटपटाहट भीड़ से भरा सुनसान चौराहा बिखरी गतियाँ, बिखरे रफ्तार गश्त में घूमती कई-कई दुष्ट इच्छाएं उसके चेहरे के बदलते रंगों की रंगत से लाज-शर्म को उतारकर अपने स्वप्नों की मूर्तियां गढ़ते झूमते लोग किसी के देवत्व की महिमा तले दबे अंधे पागल लोग... उनमें सब कुछ भूलकर सोखा के मुँह से निकले मंत्रों के सहारे दुःखों की भयावह नदी को पार कर जाने का विश्वास उग चुका था आँखें एकदम चौकस थीं शरीर बेवश जबकि उनके लिए मेरे हाथ में बस केवल सुलगती मशाल थी जिसे आस्था की बर्फीली हवाओं में सुलगाये रखना बहुत ही कठिन हो रहा था...।                         ...

'अँधेरे समय के अंधे लोग'

      'अँधेरे समय के अंधे लोग' आधुनिक समाज के अंधे लोगों में वैज्ञानिकता के बावजूद समाज में फैले भक्ति  से उपजे अंधविश्वास के कारण पैदा हुए डर और भटकाव को देखने समझने और हल की तरफ बढ़ने का एक छोटा प्रयास भर है... (4) तभी सोखा अनुभव की झोरी से चन्द्रमा की चौदह कलाएँ निकालकर उछाल देता है आकाश में एक साथ चौदह चंद्रकलाएं तैरने लगती हैं और डरे लोगों की आस्थाओं के चारो तरफ चक्कर काटती हैं इस तरह भ्रम का अबूझ अँधेरा फैलाकर जैसे ही मन्दिर की ओर मुँह कर ओझा मुस्कराते हुए हाथ जोड़कर सर झुकाता है वैसे ही भीतर से खोखली, लिजलिजी चिंता के जुओं और दैवीय आतंक से घबराई भीड़ भीतर ही भीतर एकदम से झुक सी जाती हैं बाबा के प्रेमिल शब्द गढ़ लेते हैं परिभाषा भावनात्मक-हिंसा की ऊँगलियों के इशारे और धर्म के हल्के दवाब से ही खड़ी भीड़ की बदल जाती है पूरी की पूरी दुनिया ही...।                                          ('अँधेरे समय के अंधे लोग' से)