अँधेरे समय के अंधे लोग
'अँधेरे समय के अंधे लोग' आधुनिक समाज के अंधे लोगों में वैज्ञानिकता के बावजूद समाज में फैले भक्ति से उपजे अंधविश्वास के कारण पैदा हुए डर और भटकाव को देखने समझने और हल की तरफ बढ़ने का एक छोटा प्रयास भर है... क्रमशः (5) इस अंधेरे में पता नही चलता राह किधर है और खाई किधर स्वार्थों की सुखयात्रा में शोषण की बढ़ती अतिशयता अंधी आँखें नही देख पाती छिपी वेदना गुप्त चिंताओं की छटपटाहट भीड़ से भरा सुनसान चौराहा बिखरी गतियाँ, बिखरे रफ्तार गश्त में घूमती कई-कई दुष्ट इच्छाएं उसके चेहरे के बदलते रंगों की रंगत से लाज-शर्म को उतारकर अपने स्वप्नों की मूर्तियां गढ़ते झूमते लोग किसी के देवत्व की महिमा तले दबे अंधे पागल लोग... उनमें सब कुछ भूलकर सोखा के मुँह से निकले मंत्रों के सहारे दुःखों की भयावह नदी को पार कर जाने का विश्वास उग चुका था आँखें एकदम चौकस थीं शरीर बेवश जबकि उनके लिए मेरे हाथ में बस केवल सुलगती मशाल थी जिसे आस्था की बर्फीली हवाओं में सुलगाये रखना बहुत ही कठिन हो रहा था...। ...