'आषाढ़ का एक दिन' का मंचन
समीर कुमार पाण्डेय की एक रपट
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आज बापू भवन बलिया में लगातार जोरदार बारिश के बावजूद संकल्प साहित्यिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था, बलिया द्वारा आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ जनार्दन राय जी ने दीप प्रज्वलित कर किया।
जिसके प्रथम सत्र में संकल्प के सचिव आशीष त्रिवेदी की अगुआई में 'संकल्प' द्वारा जनपद के साहित्य कला प्रेमियों की उपस्थिति में साहित्य जगत के प्रख्यात कवि अनहद पत्रिका के सम्पादक, 'मोछू नेटुआ' जैसी महत्वपूर्ण कविता के प्रणेता संतोष चतुर्वेदी, अपनी देसज भाषा के शब्दों से चकित कर देने वाले कहानी लेखक असित मिश्र और अद्भुत रंगकर्मी अमित पाण्डेय को संकल्प सम्मान-2017 से सम्मानित किया गया। यह क्षण बलिया जैसे छोटे शहर के नगरवासियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में मोहन राकेश कृत नाटक 'आषाढ़ का एक दिन' का सफल मंचन आशीष त्रिवेदी के निर्देशन में किया गया। 'आषाढ़ का एक दिन' (सन् 1958) नाटककार मोहन राकेश द्वारा रचित हिंदी के आधुनिक युग का प्रथम नाटक कहा जाता है। 1959 में इसे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ नाटक होने के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया और कईं प्रसिद्ध निर्देशक इसे मंच पर ला चुकें हैं। 1971 में निर्देशक मणि कौल ने इस पर आधारित एक फ़िल्म बनाई जिसने आगे जाकर साल की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीत लिया।
आषाढ़ का एक दिन महाकवि कालिदास के निजी जीवन पर केन्द्रित होने के साथ-साथ उसकी प्रसिद्धि और प्रेयसी मल्लिका की नियति का चित्र है। कालिदास मल्लिका के लिए सबकुछ है एक स्वप्न है जबकि मल्लिका कालिदास की प्रेरणा। केवल यही नही मोहन राकेश ने अपने इस नाटक में कालिदास, विलोम, मल्लिका और अम्बिका इन चारों किरदारों को बराबरी का मौका दिया है। एक ओर नायक कालिदास है, तो दूसरी ओर उसके सामने उतनी ही मजबूती से खड़ा है विलोम, जो मल्लिका का पति बनता है। दूसरी ओर सपनों में खोने वाली नायिका है मल्लिका। उसके सामने किरदार है अंबिका का, जो मल्लिका की मां है। वह मल्लिका की अपेक्षा कहीं ज्यादा यर्थाथवादी सोच रखती है और हमेशा मल्लिका को समझाने की कोशिश करती दिखती है। यही कारण है कि इस नाटक में इन चारों कलाकारों के लिए असीम गुंजाइश नजर आती है। नाटक को मंचित करने के लिए आप किसी भी कलाकार को कालिदास, विलोम, मल्लिका और अंबिका के रोल का ऑफर कीजिए, वह तुरंत तैयार हो जाएगा। जिसे आप कालिदास का रोल दे रहे हों, यदि उसे बाद में विलोम का रोल भी देंगे तो वह मना नहीं करेगा। इस नाटक में कलाकार को अपनी अभिनय क्षमता दिखाने के लिए काफी गुंजाइश है। एक-एक किरदार के लिए इतनी जगह हैं कि उसमें वह खुद को पूरी तरह अभिव्यक्त कर सके।
इस नाटक में कालिदास अपने करियर के लिए अपनी प्रेमिका और गांव को छोड़कर उज्जैन जाते हैं कामयाब होने के बाद न गांव की सुध लेते हैं और न ही बद्तर जीवन जी रही प्रेमिका की। आज के बच्चे भी अपने लोगों और जमीन को छोड़कर पहले उच्च-शिक्षा के लिए आईआईटी आईआईएम वगैरह में पढ़ने के लिए दूसरे शहर जाते हैं फिर जॉब के लिए विदेश। उनके करियर का ग्राफ तो बढ़ जाता है साथ ही उनके अपने उनकी एक झलक पाने का इंतजार करते रहते हैं जबकि विदेशों में उनका वीजा समय बढ़ता जाता है। इधर अंततः लोगों के पास रह जाता है अकेलापन और अवसाद.। 'आषाढ़ का एक दिन' सुगठित भावनात्मक यथार्थवादी नाटक है जिसमे वाह्य और आंतरिक अंतर्द्वंद्व को संवेदनशीलता के साथ देखा गया है। इस नाटक में कालिदास राजकवि तो बनता है पर उसकी प्रेयसी मल्लिका नही मिलती। इसको आधुनिक सन्दर्भ में देखते हैं तो पाते हैं कि आजकल कुछ पाने के लिए हम क्या-क्या खो देते हैं। इसीलिए कालिदास के जीवन पर आधारित यह नाटक आज भी प्रासंगिक है।
आज शाम इसी नाटक का सफल मंचन आशीष त्रिवेदी के निर्देशन में सामाजिक सांस्कृतिक संस्था 'संकल्प', बलिया द्वारा बाबू भवन में किया गया। इस नाटक की भाषा क्लिष्ट होने के बावजूद पात्रों के संवाद में जो प्रवाहमयता दिखी वह उनके मेहनत और लगन को दर्शाती है। सभी पात्रों के संवादों की अभिव्यक्ति बहुत ही प्रसंसनीय रही। अपनी सुन्दर सुघड़ साहित्यिक भाषा और कमजोर लाइटिंग के बावजूद भी व्यंजक और चाक्षुष बिम्बों के दर्शन कई स्थानों पर हुए जो इस नाटक की मूल विशेषता है। पात्रों में कालिदास-अमित पाण्डेय, मल्लिका-स्मृति और अम्बिका-ट्विंकल गुप्ता आदि पात्रों ने अपनी भूमिका में उत्तरोत्तर विकास करते हुए गजब रूप से प्रभावित किया। परन्तु 'विलोम' नामक पात्र इस नाटक की रीढ़ है जो कालिदास-मल्लिका की भावात्मकता को अपने तर्कों से नई ऊंचाइयों पर ले जाता है। इस महत्वपूर्ण पात्र के साथ आनंद चौहान ने बहुत ईमानदारी दिखाई है... इनकी जितनी सराहना की जाये कम है। इसके अलावा अन्य पात्रों में प्रियंगुमंजरी, दन्तुल, मातुल, निक्षेप, अनुस्वार, अनुनासिक, रंगिणि, संगिणी की भूमिका में सभी पात्रों
ने अपनी किरदार के साथ पूरा न्याय किया। हमारे एम. ए. के पाठ्यक्रम में यह नाटक था उस वक्त नाटक को पढ़ते-पढ़ते कई बार मन में आषाढ़ के बादल उमड़ने-घुमड़ने लगते थे पर आज साक्षात सफल और ईमानदार मंचन देख वह बरस ही पड़ते जो खुद को मोबाईल में छुपा लिया न होता। इतने कम संसाधनों में 'संकल्प' की गजब की अभिव्यक्ति... सचमुच भाई लाजबाब... अप्रतिम...!!!
............*भावना का भावना से वरण*...........
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आज बापू भवन बलिया में लगातार जोरदार बारिश के बावजूद संकल्प साहित्यिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था, बलिया द्वारा आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ जनार्दन राय जी ने दीप प्रज्वलित कर किया।
जिसके प्रथम सत्र में संकल्प के सचिव आशीष त्रिवेदी की अगुआई में 'संकल्प' द्वारा जनपद के साहित्य कला प्रेमियों की उपस्थिति में साहित्य जगत के प्रख्यात कवि अनहद पत्रिका के सम्पादक, 'मोछू नेटुआ' जैसी महत्वपूर्ण कविता के प्रणेता संतोष चतुर्वेदी, अपनी देसज भाषा के शब्दों से चकित कर देने वाले कहानी लेखक असित मिश्र और अद्भुत रंगकर्मी अमित पाण्डेय को संकल्प सम्मान-2017 से सम्मानित किया गया। यह क्षण बलिया जैसे छोटे शहर के नगरवासियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में मोहन राकेश कृत नाटक 'आषाढ़ का एक दिन' का सफल मंचन आशीष त्रिवेदी के निर्देशन में किया गया। 'आषाढ़ का एक दिन' (सन् 1958) नाटककार मोहन राकेश द्वारा रचित हिंदी के आधुनिक युग का प्रथम नाटक कहा जाता है। 1959 में इसे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ नाटक होने के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया और कईं प्रसिद्ध निर्देशक इसे मंच पर ला चुकें हैं। 1971 में निर्देशक मणि कौल ने इस पर आधारित एक फ़िल्म बनाई जिसने आगे जाकर साल की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीत लिया।
आषाढ़ का एक दिन महाकवि कालिदास के निजी जीवन पर केन्द्रित होने के साथ-साथ उसकी प्रसिद्धि और प्रेयसी मल्लिका की नियति का चित्र है। कालिदास मल्लिका के लिए सबकुछ है एक स्वप्न है जबकि मल्लिका कालिदास की प्रेरणा। केवल यही नही मोहन राकेश ने अपने इस नाटक में कालिदास, विलोम, मल्लिका और अम्बिका इन चारों किरदारों को बराबरी का मौका दिया है। एक ओर नायक कालिदास है, तो दूसरी ओर उसके सामने उतनी ही मजबूती से खड़ा है विलोम, जो मल्लिका का पति बनता है। दूसरी ओर सपनों में खोने वाली नायिका है मल्लिका। उसके सामने किरदार है अंबिका का, जो मल्लिका की मां है। वह मल्लिका की अपेक्षा कहीं ज्यादा यर्थाथवादी सोच रखती है और हमेशा मल्लिका को समझाने की कोशिश करती दिखती है। यही कारण है कि इस नाटक में इन चारों कलाकारों के लिए असीम गुंजाइश नजर आती है। नाटक को मंचित करने के लिए आप किसी भी कलाकार को कालिदास, विलोम, मल्लिका और अंबिका के रोल का ऑफर कीजिए, वह तुरंत तैयार हो जाएगा। जिसे आप कालिदास का रोल दे रहे हों, यदि उसे बाद में विलोम का रोल भी देंगे तो वह मना नहीं करेगा। इस नाटक में कलाकार को अपनी अभिनय क्षमता दिखाने के लिए काफी गुंजाइश है। एक-एक किरदार के लिए इतनी जगह हैं कि उसमें वह खुद को पूरी तरह अभिव्यक्त कर सके।
इस नाटक में कालिदास अपने करियर के लिए अपनी प्रेमिका और गांव को छोड़कर उज्जैन जाते हैं कामयाब होने के बाद न गांव की सुध लेते हैं और न ही बद्तर जीवन जी रही प्रेमिका की। आज के बच्चे भी अपने लोगों और जमीन को छोड़कर पहले उच्च-शिक्षा के लिए आईआईटी आईआईएम वगैरह में पढ़ने के लिए दूसरे शहर जाते हैं फिर जॉब के लिए विदेश। उनके करियर का ग्राफ तो बढ़ जाता है साथ ही उनके अपने उनकी एक झलक पाने का इंतजार करते रहते हैं जबकि विदेशों में उनका वीजा समय बढ़ता जाता है। इधर अंततः लोगों के पास रह जाता है अकेलापन और अवसाद.। 'आषाढ़ का एक दिन' सुगठित भावनात्मक यथार्थवादी नाटक है जिसमे वाह्य और आंतरिक अंतर्द्वंद्व को संवेदनशीलता के साथ देखा गया है। इस नाटक में कालिदास राजकवि तो बनता है पर उसकी प्रेयसी मल्लिका नही मिलती। इसको आधुनिक सन्दर्भ में देखते हैं तो पाते हैं कि आजकल कुछ पाने के लिए हम क्या-क्या खो देते हैं। इसीलिए कालिदास के जीवन पर आधारित यह नाटक आज भी प्रासंगिक है।
आज शाम इसी नाटक का सफल मंचन आशीष त्रिवेदी के निर्देशन में सामाजिक सांस्कृतिक संस्था 'संकल्प', बलिया द्वारा बाबू भवन में किया गया। इस नाटक की भाषा क्लिष्ट होने के बावजूद पात्रों के संवाद में जो प्रवाहमयता दिखी वह उनके मेहनत और लगन को दर्शाती है। सभी पात्रों के संवादों की अभिव्यक्ति बहुत ही प्रसंसनीय रही। अपनी सुन्दर सुघड़ साहित्यिक भाषा और कमजोर लाइटिंग के बावजूद भी व्यंजक और चाक्षुष बिम्बों के दर्शन कई स्थानों पर हुए जो इस नाटक की मूल विशेषता है। पात्रों में कालिदास-अमित पाण्डेय, मल्लिका-स्मृति और अम्बिका-ट्विंकल गुप्ता आदि पात्रों ने अपनी भूमिका में उत्तरोत्तर विकास करते हुए गजब रूप से प्रभावित किया। परन्तु 'विलोम' नामक पात्र इस नाटक की रीढ़ है जो कालिदास-मल्लिका की भावात्मकता को अपने तर्कों से नई ऊंचाइयों पर ले जाता है। इस महत्वपूर्ण पात्र के साथ आनंद चौहान ने बहुत ईमानदारी दिखाई है... इनकी जितनी सराहना की जाये कम है। इसके अलावा अन्य पात्रों में प्रियंगुमंजरी, दन्तुल, मातुल, निक्षेप, अनुस्वार, अनुनासिक, रंगिणि, संगिणी की भूमिका में सभी पात्रों
ने अपनी किरदार के साथ पूरा न्याय किया। हमारे एम. ए. के पाठ्यक्रम में यह नाटक था उस वक्त नाटक को पढ़ते-पढ़ते कई बार मन में आषाढ़ के बादल उमड़ने-घुमड़ने लगते थे पर आज साक्षात सफल और ईमानदार मंचन देख वह बरस ही पड़ते जो खुद को मोबाईल में छुपा लिया न होता। इतने कम संसाधनों में 'संकल्प' की गजब की अभिव्यक्ति... सचमुच भाई लाजबाब... अप्रतिम...!!!
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