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Showing posts from August, 2017
      एक-दूसरे को धता देकर इस भागती दुनिया में मानवता के लिए वापस लौटना एक जरुरी प्रक्रिया है। आज प्रस्तुत है मेरी अपनी ही कविता.... लौटना ****** लौटना एक क्रिया है जो मनुष्यों के व्याकरण में देह की इच्छायों से टपकती है कठिन है इस भागती दुनिया में धार में बहते फूल का दूसरी तरफ लौटना शहरों की तरफ भाग रहे लोगों का गाँवों की तरफ लौटना घोषित-अघोषित बढ़ते अँधेरे में उजाले की ओर लौटना ऐसे हर लौटने पर मुश्किल वक्त में थरथराती है उम्मीद... ऐसा नही कि लौटने की सारी क्रियाएं बंद हैं वह हो रही हैं उम्मीद के मुहाने पर जैसे हर बार गहरी बेचैनी लिए लौटतें हैं किसान खेतों में बाढ़ में पानी से घिरे लोग लौटते हैं घर लादकर सूखी जमीन पर मशीनरी स्कूल से थके बच्चे लौटतें हैं अपने घरों में भिखारी ठाकुर के वंशज लौटतें हैं संस्कृति और भाषा को बचाने के लिए भोजपुरी की ओर.... वैसे ही क्रियायों की उदासी झाड़कर लौटता हूँ मैं आदमियत की तरफ जब लुहलुहान हो जाती है मेरी पीठ प्रतिरोध को कंधे पर रखे-रखे स्वाद में बदलने लगती हैं रक्तरंजित दीवारें फ़िजां में गूँजती शोषित हँसी ...